उपचुनाव में प्रमुख दलों के लिए इतिहास दोहराना चुनौती : लगभग तीन दशक से कायम है भाजपा का परचम

इस बार मतदाता की चुप्पी किसको इशारा कर रही है

 

गाजियाबाद। शहर विधान सभा सीट पर इस बार तीन प्रमुख दलों के लिए चुनाव प्रतिष्ठा बन गया है क्योंकि मतदाताओं की चुप्पी सभी प्रत्याशियों को परेशान कर रही है। भाजपा के लिए कब्जा बनाए रखना चुनौती है तो समाजवादी पार्टी 20 वर्ष पुराने इतिहास को दोहराने के लिए जद्दोजहद कर रही है। वर्ष 2017 के बाद से हार का सामना कर रही बसपा भी जीत का दम भर रही है।
शहर विधायक अतुल गर्ग के सांसद चुने जाने के बाद सदर विधानसभा सीट पर उपचुनाव चल रहा है। सीट पर 461360 मतदाता प्रत्याशियों के भाग्य का फैसला करेंगे। इनमें 207314 महिलाओं की भी भागीदारी होगी। लेकिन सवाल उठता है कि क्या इस बार भी पुराने शहर की जनता ठगी जाएगी या चुने गए नए विधायक क्षेत्र में मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराएंगे।


अगर बात करें शहर के विकास और मूलभूत सुविधाओं की तो लगभग पिछले तीन दशक से एक दो बार को छोड़कर भाजपा का ही परचम नीचे से ऊपर तक लहरा रहा है। चाहे पार्षद का चुनाव हो , विधायक का हो या सांसद का हमेशा भाजपा प्रत्याशी ही विजयी होते आए हैं। चुनाव आते ही हर पार्टी का प्रत्याशी चुनावी वादों और शहर के विकास कार्यों के वादों की झड़ी लगा देते हैं किंतु चुनाव खत्म होने और विजयी होने के बाद मतदाता के मूलभूत सुविधाओं की तरफ पलट कर भी नहीं देखते।

1976 में गाजियाबाद जिला बना था, अब तक चाहे सरकार किसी की भी हो लेकिन यहां के निवासियों को अपने अधिकारों के प्रति जूझना पड़ता है। शहर की अधिकांश कॉलोनियों में आज भी पीने का साफ पानी उपलब्ध नहीं है जबकि हर बार नगर निगम चुनाव में पीने के पानी का मुद्दा उठाया जाता है किंतु चुनाव जीतने के बाद नतीजा वही ढाक के तीन पात।

एक बार फिर शहर विधायक का चुनाव जोरों पर है और मुकाबला त्रिकोणीय लग रहा है। चाहे भाजपा प्रत्याशी हो या गठबंधन का प्रत्याशी सभी का जोर इस बार लाइन पर क्षेत्र के मतदाताओं पर ज्यादा है। इस बार शहर विधानसभा सीट पर एक नई पार्टी आजाद समाज पार्टी का भी पदार्पण हुआ है जो मुकाबला को और रोचक बनाता है। अब देखना है कि 23 तारीख को नतीजे आने के बाद किसकी गाड़ी पटरी पर दौड़ती है और हारने वाले प्रत्याशी क्या घर बैठ जाएंगे या फिर क्षेत्र में काम करते रहेंगे। इस बार चुनाव में क्षेत्रीय दल भी अहम भूमिका निभा रहे हैं, इसका कारण है कि जो भी जितना वोट काट सकेगा, वह प्रतिद्वंदी पार्टी की जीत की राह में बाधा बनेगा।

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वरिष्ठ पत्रकार श्री राम की कलम से

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