अमेरिका – ईरान तनाव : युद्धविराम के बाद क्या हो भारत की रणनीति

 


वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता या घटता तनाव केवल दो देशों तक सीमित मुद्दा नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव पूरी दुनिया की राजनीति, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा पर पड़ता है। विशेष रूप से भारत जैसे विकासशील और ऊर्जा-निर्भर देश के लिए यह स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। हालिया युद्ध विराम ने भले ही तत्काल राहत दी हो, लेकिन दीर्घकालिक दृष्टि से भारत को अपनी रणनीति स्पष्ट और मजबूत रखनी होगी।

सबसे पहले, भारत की विदेश नीति का मूल आधार “संतुलन” होना चाहिए। भारत के अमेरिका के साथ रणनीतिक और आर्थिक संबंध हैं, वहीं ईरान के साथ ऊर्जा और क्षेत्रीय सहयोग जुड़ा हुआ है। ऐसे में किसी एक पक्ष का खुला समर्थन भारत के हितों को नुकसान पहुंचा सकता है। इसलिए भारत को “रणनीतिक स्वायत्तता” की नीति पर चलते हुए दोनों देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने चाहिए। यह नीति भारत को वैश्विक मंच पर एक स्वतंत्र और विश्वसनीय शक्ति के रूप में स्थापित करती है।

दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है ऊर्जा सुरक्षा। भारत अपनी कुल तेल आवश्यकता का लगभग 80 प्रतिशत आयात करता है, जिसमें खाड़ी क्षेत्र की भूमिका अत्यधिक महत्वपूर्ण है। जैसे संवेदनशील क्षेत्र में तनाव का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। इसलिए भारत को दीर्घकाल में नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों जैसे सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और जैव ईंधन की ओर तेजी से बढ़ना होगा। साथ ही इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना भी आवश्यक है, ताकि तेल पर निर्भरता धीरे-धीरे कम की जा सके।

तीसरा, समुद्री सुरक्षा भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। अरब सागर और खाड़ी क्षेत्र से होकर गुजरने वाले व्यापारिक और ऊर्जा मार्ग भारत की जीवनरेखा हैं। भारतीय नौसेना की सक्रियता, अंतरराष्ट्रीय समुद्री सहयोग और तेल टैंकरों की सुरक्षा सुनिश्चित करना समय की मांग है। यह न केवल भारत की ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित करेगा, बल्कि उसे एक जिम्मेदार समुद्री शक्ति के रूप में भी स्थापित करेगा।
चौथा, आर्थिक स्थिरता बनाए रखना भी एक बड़ी चुनौती है। जैसे ही मध्य-पूर्व में तनाव बढ़ता है, तेल की कीमतों में उछाल आता है, जिसका सीधा असर महंगाई, मुद्रा विनिमय दर और शेयर बाजार पर पड़ता है। भारत को अपने विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत बनाए रखना होगा और ऐसी नीतियां अपनानी होंगी जो बाहरी झटकों से अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रख सकें। इसके अलावा, वैकल्पिक व्यापार मार्गों और आपूर्ति स्रोतों की खोज भी आवश्यक है।

पाँचवां और अंतिम पहलू है भारत की वैश्विक भूमिका। आज भारत केवल एक क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि एक उभरती वैश्विक शक्ति है। जी 20 और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत शांति, संवाद और सहयोग की वकालत कर सकता है। यदि परिस्थितियां अनुकूल हों, तो भारत मध्यस्थ की भूमिका भी निभा सकता है, जिससे उसकी अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा और प्रभाव दोनों बढ़ेंगे। ऐसे में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव भारत के लिए चुनौती भी है और अवसर भी। यदि भारत संतुलित कूटनीति, ऊर्जा आत्मनिर्भरता, मजबूत सुरक्षा व्यवस्था और सक्रिय वैश्विक भूमिका को अपनाता है, तो वह न केवल इस संकट से सुरक्षित निकल सकता है, बल्कि अपने लिए नए अवसर भी पैदा कर सकता है। आज की दुनिया में वही देश सफल है, जो संघर्षों से दूर रहते हुए भी परिस्थितियों का लाभ उठाना जानता है और भारत के पास यह क्षमता स्पष्ट रूप से मौजूद है।


लेखक
डॉ. चेतन आनंद (कवि-पत्रकार)

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