गुर्जर समाज की राजनीति की दशा और दिशा

गुर्जर बाहुल्य कहे जाने वाले जिला गौतम बुद्ध नगर के दादरी में 29 मार्च को पीडीए के बैनर तले होने वाली जनसभा पर अब सभी राजनीतिक दलों की नजरें टिकी हुई हैं। क्योंकि विभिन्न राजनीतिक दलों में बिखरा और नेतृत्वहीन गुर्जर समाज अपनी खोई हुई राजनीतिक विरासत और अस्तित्व को काफी दिन से तलाशने की कसमकस में तो है लेकिन समाधान का कोई ठोस रास्ता नजर न आने की वजह से हताश हैं। इस हताशा और निराशा की वजह से ही गुर्जर समाज सत्ता के साथ कदम ताल करता रहा है। सत्ता के साथ कदमताल करने की गुर्जर समाज की कमजोरी को भांपकर ही राजनीतिक दलों ने इस समाज को उतनी राजनीतिक भागीदारी नही दी जितनी भागीदारी का यह समाज हकदार है।
लेकिन दादरी में 29 मार्च 2026 को होने वाली जनसभा के मौके को गुर्जर समाज अपने खोए हुई राजनीतिक अस्तित्व को पुनः हासिल के लिए इस्तेमाल करने पर चर्चा करता नजर आ रहा है। इसमें कोई दो राय नहीं कि अगर गुर्जर समाज ने राजनीतिक सूझबूझ से निर्णय लिया तो इस सभा की कामयाबी गुर्जर राजनीति के लिए मील का पत्थर साबित हो सकती है। जिसका लाभ हर राजनीतिक दल जुड़े गुर्जर समाज के नेताओं को मिलना स्वाभाविक है।आमतौर पर देखा गया है कि अलग-अलग राजनीतिक दलों से जुड़े होने के बावजूद अन्य जाति समाज के लोग अपने नेताओं के सपोर्ट में खड़े होकर उन्हें राजनीतिक ताकत देने का काम करते हैं लेकिन स्वाभिमान की राजनीति करने वाला गुर्जर समाज जिस दल के साथ जुड़ा है वह उसी के प्रति पूर्ण समर्पण भाव से काम करता है जो चारित्रिक दृष्टि से तो अच्छी बात हो सकती है लेकिन शायद आज के राजनीतिक परिवेश में यह नुकसानदेह साबित हो रहा है। यहां तक कि अन्य कई जाति समाज के लोग अलग-अलग दलों में रहते हुए भी जातीय और सामाजिक संगठनों द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में एक मंच पर उपस्थित होते हुए देखे गए हैं लेकिन लकीर का फकीर बनकर राजनीति करने वाले गुर्जर समाज में राजनीतिक जागरूकता और परिपक्वता का यह अभाव जग जाहिर है।
अगर गुर्जर समाज ने राजनीतिक जागरूकता और परिपक्वता दिखाई तो दादरी में होने वाली 29 मार्च की जनसभा निश्चित तौर पर गुर्जर राजनीति का भविष्य और दशा दिशा तय कर सकती है। यह जनसभा गुर्जर राजनीति की एक नई पटकथा लिख सकती है। लेकिन यह तभी संभव है जब गुर्जर समाज यह ठान ले कि इस मौके को हाथ से कतई नहीं जाने देंगे। राजनीति में गुर्जर समाज की अधिकाधिक भागीदारी और अस्तित्व को कायम रखने के लिए विभिन्न नामों से संचालित गुर्जर संगठनों को भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभानी होगी अन्यथा ऐसे संगठनों के पदों पर आसीन होकर अपना महिमा मंडन कराने और स्वागत समारोह आयोजित कराने से इस समाज का कोई भला होने वाला नही है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि अगर गुर्जर समाज के युवाओं ने इस सभा को सफल बनाने की हुंकार भर दी तो इसका असर आगामी 2027 के चुनाव में उस वक्त स्पष्ट नजर आएगा जब विभिन्न राजनीतिक दल इस समाज को अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए अच्छी खासी भागीदारी देकर अधिकाधिक उम्मीदवार मैदान में उतारना चाहेंगे। जिस गौतम बुद्ध नगर की अब एकमात्र दादरी सीट तक सिमट चुका गुर्जर समाज अपनी राजनीतिक विरासत वापसी के लिए बहुत ही बेचैन नजर आ रहा है और अगर टांग खिंचाई की राजनीति नहीं हुई तो इस सभा के जरिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश का युवा और किसान गुर्जर राजनीति की नई इबारत लिखने में कामयाब हो सकता है। अब देखना होगा कि दादरी में आयोजित होने वाली इस सभा का लाभ उठाकर गुर्जर समाज अपनी खोई हुई राजनीतिक विरासत लौटा पाएगा या फिर सदैव की भांति टांग खिंचाई की राजनीति में उलझ कर रह जाएगा। हालांकि जानकारी में आया है कि इस सभा में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लगभग 132 विधानसभा क्षेत्र के लोग शिरकत करेंगे लेकिन सभा की सफलता स्थानीय लोगों के संख्या बल पर ज्यादा निर्भर करती है।
इस मौके पर इस सभा के आयोजकों को भी यह तय करना होगा कि क्या वह अपने मुख्य अतिथि से गौतम बुद्ध नगर में पंचायत पुनर्गठन, दादरी स्थित गुर्जर डिग्री कॉलेज को विश्वविद्यालय में अपग्रेड कराने, किसानों की समस्याओं के निराकरण और उद्योगों में स्थानीय युवाओं को रोजगार दिलाने जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों की घोषणा कराकर लोगों को लुभा पाएंगे। अगर आयोजक ऐसे ज्वलंत मुद्दों पर घोषणा करा पाए तो इस सभा के प्रति उत्साहित नजर आ रहा गौतम बुद्ध नगर का युवा और किसान इस सभा को सफल बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ेंगे।


