बड़े आंदोलनों के दौरान विरोध करने के लिए गुर्जर युवाओं का हो रहा है दुरुपयोग

जिन राजनीतिक दलों से राजनेता जुड़े होते हैं हर एक का अपने अपने राजनीतिक दलों की उपलब्धियां गिनाना और प्रशंसा करना आम बात है। लेकिन किसी व्यक्ति विशेष अथवा नेता पर जाति सूचक शब्दों से अशोभनीय टिप्पणी करना कोई भी सभ्य समाज पसंद नहीं करता। विगत संसद सत्र के दौरान दिल्ली के पूर्व सांसद रमेश बिधूड़ी द्वारा एक मुस्लिम सांसद के लिए की गई अशोभनीय टिप्पणी उस वक्त सभी को नागवार गुजरी थी। यहां तक कि गुर्जर समाज से ताल्लुक़ात रखने वाले रमेश बिधूड़ी द्वारा संसद के अंदर बोली गई अशोभनीय और असंसदीय भाषा से गुर्जर समाज को शर्मसार होना पड़ा था।
जंतर मंतर पर हुए आंदोलन के संबंध में आज फिर पूर्व सांसद रमेश बिधूड़ी द्वारा की गई यह टिप्पणी कि
जंतर मंतर पर पंचर लगाने वालों की औलादें इकट्ठा हुई थी निश्चित तौर पर शर्मसार करने वाली है। इतना ही नहीं जिस छात्र आंदोलन से हुए डैमेज को कंट्रोल करने के लिए भाजपा के शीर्ष नेताओं को अपनी पार्टी के कद्दावर नेता धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा दिलाना पड़ा था उस छात्र आंदोलन के विषय में रमेश बिधूड़ी द्वारा की गई टिप्पणी गुर्जर समाज को तो शर्मसार करने वाली है ही इसके साथ-साथ निश्चित तौर पर भाजपा के लिए भी नुकसान देह साबित हो सकती है। डैमेज करने वाली ऐसी बयानों पर आमतौर पर राजनीतिक दल तो यह कहकर पीछा छुड़ा लेते हैं कि यह उनका निजी बयान है लेकिन सस्ती लोकप्रियता के लिए ऐसी अशोभनीय भाषा बोलने वाले गुर्जर समाज के नेता इस समाज को कहां ले जाकर छोड़ेंगे।
शायद कुछ ऐसे ही नेताओं द्वारा उकसाए गए युवा भी बड़े-बड़े आंदोलन के दौरान आंदोलनकारियों के बीच घुसकर हिंसात्मक कदम उठाकर समाज को बदनाम करते रहे हैं। राजस्थान और दिल्ली के कई उदाहरण आपके समक्ष हैं। समझ नहीं आता कि आखिर ऐसे लोग गुर्जर समाज को किस दिशा में ले जाने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे चंद लोगों के कुत्सित कारनामों पर रोक लगाने के लिए गुर्जर संगठनों के छत्रपों को जरूर आगे आना होगा अन्यथा सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए पथ भ्रमित लोग गुर्जर समाज को कलंकित कराते रहेंगे।
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