कैसे सिद्ध करेंगे की हम भारतीय है ? जब सभी कागज़ात फर्जी बन सकते हैं तो जिम्मेदार कौन?

जब सब कुछ सलैक्टिव तरीके से चल रहा है तो सरकार अपनी मंशा साफ़ क्यों नहीं करती कि वो क्या चाहती है


भारतीय होने की पहचान आखिर किस आधार पर तय होगी? यदि इसका आधार कागज़ात हैं, तो सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब आए दिन फर्जी आधार कार्ड, फर्जी जन्म प्रमाणपत्र, फर्जी राशन कार्ड, फर्जी वोटर आईडी और यहां तक कि फर्जी पासपोर्ट पकड़े जाते हैं, तब एक आम नागरिक अपनी नागरिकता कैसे सिद्ध करेगा? यदि दस्तावेज़ ही अंतिम प्रमाण हैं और वही अविश्वसनीय साबित हो रहे हैं, तो इसकी जिम्मेदारी नागरिक की है या उस व्यवस्था की जिसने इन दस्तावेज़ों को जारी किया?

हालिया उदाहरण देखते हैं प्रभु श्री राम के मंदिर में चंदा,दान व कीमती धातुओं की डकैती खुलें आम हुईं। ट्रस्ट के पैसों से सस्ती जमीनें कई कई गुना पैसा खर्च कर खरीदीं गई। समय रहते शिकायत भी हुई लेकिन कार्यवाही नदारद रहीं। जबकि इस ट्रस्ट को पीएमओ ने गठित किया था, दो दो सक्षम पदेन आईएएस अधिकारी ट्रस्ट में थे लेकिन फिर भी चोरी, डकैती,व पैसों की बंदरबांट सालों से जारी थी। आखिर क्यों ? इसके लिए क्या वो लोग जिम्मेदार नहीं हैं। जब हल्ला मचा तो छोटे कर्मचारियों पर मुकदमा दर्ज कर जेल भेज दिया गया। वो मगरमच्छ क्यों बचा लिए गए जिन पर इस तरह की गड़बड़ियां रोकने की जिम्मेदारी सरकार ने ही दी थी। इसे ही कहते हैं सरकार की सलैक्टिव कार्यवाही।

हर चुनाव में प्रधानमंत्री, गृहमंत्री चीख चीख कर घुसपैठियों का मुद्दा उठाते हैं। इसी का बहाना कर दिल्ली, बिहार,व पश्चिम बंगाल में SIR किया गया। लाखों लाख वोट कटे। लेकिन किसी भी प्रदेश में घुसपैठियों की संख्या नहीं बताई गई आखिर क्यों ? अपने वोट के अधिकार को चुनौती देने कुछ लोग सुप्रीम कोर्ट भी गए। लेकिन तर्क व तथ्यों को ध्यान में ना रखते हुए बड़ी बेशर्मी से कह दिया गया कि इस बार नहीं तो अगले चुनाव में वोट डाल लेना। इसे कहते है मजबूत व सलैक्टिव न्याय व्यवस्था ।

चुनाव आयोग खुल्लमखुल्ला कैसे एक पार्टी पर मेहरबान होकर उसे चुनाव दर चुनाव जिताने में लगा हुआ है। इसी को कहते हैं सलैक्टिव चुनाव परिणाम। सलैक्टिव तरीके से ही इडी, सीबीआई, इनकम टैक्स आदि एजेंसी कहां छापे मारेगी किसके खिलाफ जांच करेगी वगैरहा वगैहरा जिस देश में खुल्लमखुल्ला चल रहा हो, इसी को कहते हैं सलैक्टिव कार्यवाही।

एक जज के यहां बोरो में जलते नोट मिलते हैं लेकिन आज़ तक उसमें क्या हुआ किसी को भी पता नहीं और वो आज़ भी जज बनकर लोगों के भाग्य का फैसला कर रहा है। इसे कहते है सलैक्टिव कार्यवाही। क्या अब हर भारतीय ये उम्मीद कर सकता है कि इसी तंत्र में जब एनआरसी लागू होगा तो वो किसे भारतीय मानेंगे और किसे नहीं क्या ये पूरी इमानदारी से तय किया जाएगा ? इसका सबसे बड़ा उदाहरण असम है। भारतीय पासपोर्ट पर ये कह देना कि ये यात्रा दस्तावेज है क्या उन करोड़ों भारतीयों पर शंका की तलवार नहीं लटका दी गई जो आज़ विदेशों में नौकरी या पढ़ाई करने गए हैं। क्यों सरकार ने हर उस भारतीय को शक के दायरे में लाकर खड़ा कर दिया जो भारतीय पासपोर्ट पर विदेश यात्रा करता है। कभी आधार कार्ड फर्जी, कभी वोटर आईडी फर्जी, कभी राशनकार्ड फर्जी, जन्मपत्रिका फर्जी,जन्म प्रमाण पत्र फर्जी, पढ़ाई-लिखाई के दस्तावेज फर्जी।

 

डिग्री से याद आया कहने को तो लोग प्रधानमंत्री की डिग्री भी फर्जी बताते हैं रहस्य उजागर ना हो आरटीआई व कोर्ट भी डिग्री देने से मना कर देते हैं। आखिर देश में ये सब क्यों और कौन करा रहा है। इसे ही कहते हैं सलैक्टिव कार्यवाही। ईमानदार नागरिकों पर संदेह करना न्यायसंगत कैसे माना जा सकता है? जिन संस्थाओं पर पहचान सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी है, उनसे जवाबदेही भी उतनी ही अपेक्षित है। केवल कागज़ मांगना समाधान नहीं है; समाधान है दस्तावेज़ जारी करने की प्रक्रिया को पारदर्शी, सुरक्षित और जवाबदेह बनाना।

आज बहस केवल नागरिकता की नहीं, बल्कि शासन व सरकार की विश्वसनीयता की है। यदि आज़ इमानदारी से जांच हो जाएं तो हमारे कितने ही प्रतिनिधियों की जीत भी संदेह के दायरे में आ सकती है। लेकिन जांच सलैक्टिव तरीके से नहीं इमानदारी व पार्दर्शिता से हो। लोकतांत्रिक देश में सबसे पहले कठघरे में आम नागरिक नहीं, बल्कि वह तंत्र होना चाहिए जो ऐसी गड़बड़ियो के लिए जिम्मेदार है। देश में मजबूती नागरिकों पर संदेह से नहीं, बल्कि मजबूत और भरोसेमंद संस्थाओं से आती है। या सरकार सीधे सीधे घोषणा करदे कि एक विशेष पट्टा गले में धारण करने वाला ही इस देश का असली नागरिक हैं। जनाब देश में और भी बहुत समस्याएं हैं उन पर भी ध्यान देना जरूरी है। या फिर अपनी विफलताओं को इस तरह के मुद्दे उछाल कर ध्यान भटकाने का प्रयास है।

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लेखक
नरोत्तम शर्मा वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभ लेखक

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