कारण, नुकसान, सरकारी कार्रवाई और अनुत्तरित सवाल

मई और जून का महीना आते ही हिमालयी राज्यों, विशेषकर उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के जंगलों से धुएँ की खबरें आने लगती हैं। हर वर्ष हजारों हेक्टेयर वन क्षेत्र आग की चपेट में आ जाता है, वन्यजीवों का जीवन संकट में पड़ जाता है। इससे स्थानीय लोगों की आजीविका प्रभावित होती है और करोड़ों रुपये की प्राकृतिक संपदा नष्ट हो जाती है। सवाल यह है कि आखिर पहाड़ों के जंगलों में आग की घटनाएँ सबसे अधिक मई-जून में ही क्यों होती हैं? क्या यह केवल प्राकृतिक कारणों का परिणाम है या इसके पीछे मानवीय हस्तक्षेप भी है?
वन विशेषज्ञों का मानना है कि जंगलों में आग लगने के पीछे कई कारण एक साथ काम करते हैं। मार्च से जून के बीच पहाड़ी क्षेत्रों में वर्षा बहुत कम होती है। तापमान बढ़ जाता है और जंगलों में गिरी सूखी पत्तियाँ तथा घास अत्यधिक ज्वलनशील हो जाती हैं। उत्तराखंड के बड़े भूभाग में फैले चीड़ के जंगल इस समस्या को और गंभीर बना देते हैं। चीड़ की सूखी सुइयाँ जिन्हें स्थानीय भाषा में पिरूल कहा जाता है, आग को तेजी से फैलाने का काम करती हैं। तेज हवाएँ इस आग को कुछ ही घंटों में कई किलोमीटर तक पहुँचा देती हैं। हालाँकि विशेषज्ञ केवल चीड़ को दोषी नहीं मानते। उनका कहना है कि अधिकांश वनाग्नि घटनाओं के पीछे मानवजनित कारण अधिक महत्वपूर्ण हैं। वन विभाग की रिपोर्टों और विभिन्न न्यायिक मंचों पर प्रस्तुत आँकड़ों के अनुसार बड़ी संख्या में आग की घटनाएँ मानवीय लापरवाही अथवा जानबूझकर की गई हरकतों का परिणाम होती हैं। बीड़ी-सिगरेट के टुकड़े फेंकना, सूखी घास जलाना, चरागाह तैयार करने के लिए आग लगाना, शहद या अन्य वन उपज एकत्र करने के दौरान आग का प्रयोग करना तथा कुछ मामलों में शरारतन आग लगाना भी इसके प्रमुख कारण बताए जाते हैं। एक याचिका में तो यह दावा किया गया था कि लगभग 90 प्रतिशत वनाग्नि घटनाएँ मानवजनित होती हैं।

पिछले कुछ वर्षों के आँकड़े इस समस्या की गंभीरता को स्पष्ट करते हैं। वर्ष 2024 में उत्तराखंड सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय को बताया था कि राज्य में जंगलों में आग लगने की लगभग 398 घटनाएँ दर्ज की गईं। वहीं नवंबर 2023 से मई 2024 के बीच आग की 900 से अधिक घटनाओं का उल्लेख विभिन्न रिपोर्टों में किया गया। वर्ष 2026 में भी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। हालिया आँकड़ों के अनुसार राज्य में लगभग 400 वनाग्नि घटनाएँ दर्ज की जा चुकी हैं और सैकड़ों हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ है। कई जिलों में लगातार आग लगने की घटनाओं ने प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है। इन घटनाओं का प्रभाव केवल पेड़ों तक सीमित नहीं रहता। वनाग्नि के कारण जैव विविधता को भारी नुकसान पहुँचता है। अनेक छोटे जीव-जंतु और पक्षी आग की चपेट में आकर मर जाते हैं। बड़े वन्यजीव अपने प्राकृतिक आवास छोड़ने को विवश हो जाते हैं, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ता है। आग मिट्टी की ऊपरी उपजाऊ परत को भी नष्ट कर देती है। इसके परिणामस्वरूप वर्षा होने पर मिट्टी का कटाव बढ़ जाता है और भूस्खलन की आशंका अधिक हो जाती है। पहाड़ों के जलस्रोतों पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि बार-बार लगने वाली आग जंगलों की जल धारण क्षमता को कम करती है, जिससे झरनों और प्राकृतिक स्रोतों का जलस्तर प्रभावित हो सकता है। वनाग्नि का एक बड़ा प्रभाव जलवायु पर भी पड़ता है। जंगलों में लगी आग से बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य प्रदूषक गैसें वातावरण में पहुँचती हैं। इससे वायु प्रदूषण बढ़ता है और वैश्विक तापवृद्धि की समस्या और गंभीर हो जाती है। विडंबना यह है कि जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती गर्मी और सूखा वनाग्नि को बढ़ावा देते हैं। जबकि वनाग्नि स्वयं जलवायु परिवर्तन को और तीव्र बनाती है। इस प्रकार एक दुष्चक्र तैयार हो जाता है।
वन क्षेत्र को हुए नुकसान को लेकर भी विभिन्न आँकड़े सामने आए हैं। कुछ स्वतंत्र अध्ययनों और सैटेलाइट विश्लेषणों में यह संकेत मिला है कि वास्तविक रूप से प्रभावित क्षेत्र कई बार सरकारी आँकड़ों से कहीं अधिक होता है। सैटेलाइट चित्रों के आधार पर किए गए विश्लेषणों में लाखों हेक्टेयर क्षेत्र पर आग के प्रभाव के संकेत मिले हैं। इससे यह बहस भी तेज हुई है कि वनाग्नि की वास्तविक स्थिति का आकलन और अधिक पारदर्शी तथा वैज्ञानिक ढंग से किया जाना चाहिए। इस गंभीर स्थिति पर न्यायपालिका ने भी चिंता व्यक्त की है। वर्ष 2024 में सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तराखंड में जंगलों की आग को लेकर राज्य सरकार से कड़े सवाल पूछे थे। अदालत ने कहा कि मीडिया में भयावह तस्वीरें दिखाई दे रही हैं और यह जानना आवश्यक है कि सरकार आग रोकने के लिए क्या कदम उठा रही है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल बारिश या क्लाउड सीडिंग जैसे अस्थायी उपायों पर निर्भर नहीं रहा जा सकता। इसके लिए दीर्घकालिक और वैज्ञानिक रणनीति विकसित करनी होगी।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने भी वनाग्नि के मामलों को गंभीरता से लेते हुए वन विभाग से कई महत्वपूर्ण जानकारियाँ माँगी हैं। इनमें वन कर्मियों की उपलब्धता, आपातकालीन प्रबंधन व्यवस्था, आग लगने की स्थिति में त्वरित प्रतिक्रिया प्रणाली और संसाधनों की स्थिति जैसे विषय शामिल हैं। एनजीटी का मानना है कि प्रभावी प्रबंधन और जवाबदेही के बिना वनाग्नि की समस्या पर नियंत्रण संभव नहीं है।
सरकारों ने भी समय-समय पर कई निर्देश जारी किए हैं। संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाने, फायर लाइन बनाने, ड्रोन और सैटेलाइट तकनीक का उपयोग करने, स्थानीय समुदायों को जागरूक करने और वन कर्मियों की संख्या बढ़ाने जैसे कदम उठाए जा रहे हैं। कई स्थानों पर पिरूल संग्रहण को प्रोत्साहित किया गया है ताकि जंगलों में ज्वलनशील सामग्री की मात्रा कम हो सके। इसके अतिरिक्त आग लगाने वालों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई के निर्देश भी दिए गए हैं। कार्रवाई के मोर्चे पर भी कुछ आँकड़े उल्लेखनीय हैं।
राज्य सरकार द्वारा सर्वोच्च न्यायालय को दी गई जानकारी के अनुसार वनाग्नि से जुड़े सैकड़ों आपराधिक मामले दर्ज किए गए हैं और अनेक व्यक्तियों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की गई है। फिर भी यह प्रश्न बना हुआ है कि यदि हर वर्ष बड़ी संख्या में घटनाएँ मानवजनित हैं, तो दोषियों की पहचान और दंड की प्रक्रिया अभी भी अपेक्षित स्तर तक प्रभावी क्यों नहीं हो पाई है। वास्तव में वनाग्नि की समस्या केवल कानून- व्यवस्था या वन विभाग की चुनौती नहीं है। यह पर्यावरण, जल संरक्षण, जैव विविधता, पर्यटन, स्थानीय अर्थव्यवस्था और जनजीवन से जुड़ा हुआ विषय है। पहाड़ों के जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं हैं, बल्कि वे नदियों, झरनों, वन्यजीवों और लाखों लोगों की जीवनरेखा हैं। यदि इन्हें बचाना है तो सरकार, प्रशासन, न्यायपालिका, वैज्ञानिक समुदाय और स्थानीय समाज सभी को मिलकर काम करना होगा।
हर वर्ष मई-जून में धधकते जंगल हमें यह याद दिलाते हैं कि प्रकृति के साथ लापरवाही का परिणाम कितना विनाशकारी हो सकता है। अब समय आ गया है कि वनाग्नि को मौसमी घटना मानकर नजरअंदाज करने के बजाय इसे राष्ट्रीय पर्यावरणीय चुनौती के रूप में देखा जाए। तभी हिमालय की हरियाली, जैव विविधता और भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित प्राकृतिक धरोहर को बचाया जा सकेगा।
हाल के वर्षों में हुईं घटनाएं
2024 में उत्तराखंड सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि जंगलों में आग की 398 घटनाएं दर्ज हुईं।
2024-25 फायर सीजन रहा। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका के अनुसार नवंबर 2023 से मई 2024 तक आग की 910 घटनाएं सामने आई थीं। 2026 में रिपोर्टों के अनुसार 394 से अधिक वनाग्नि घटनाएं दर्ज हुईं। 331 हेक्टेयर से अधिक वन क्षेत्र जल गया। 2 से 3 लोगों की मृत्यु की सूचना सामने आई। चमोली सहित कई जिले गंभीर रूप से प्रभावित हुए।
कितना नुकसान हुआ?
2026 में ही सैकड़ों हेक्टेयर जंगल जल चुके हैं। वास्तविक नुकसान शायद कहीं अधिक, वन विभाग और सैटेलाइट आंकड़ों में बड़ा अंतर पाया गया है। एक रिपोर्ट के अनुसार नवंबर 2023 से जून 2024 के बीच सैटेलाइट विश्लेषण में लगभग 1.80 लाख हेक्टेयर क्षेत्र आग से प्रभावित दिखाई दिया, जबकि विभागीय आंकड़े इससे काफी कम थे।
कितने लोगों पर कार्रवाई हुई?
सुप्रीम कोर्ट में उत्तराखंड सरकार ने बताया था कि जंगलों में आग से जुड़े 350 आपराधिक मामले दर्ज किए गए। 62 लोगों के खिलाफ कार्रवाई, मुकदमे दर्ज किए गए। 2026 में भी राज्य सरकार ने आग लगाने वालों की गिरफ्तारी और कठोर दंड के निर्देश जारी किए हैं।



