जनता के धैर्य की परीक्षा आखिर कब तक ?

ज्यों ज्यों सवाल बढ़ते गए, त्यों त्यों जवाब नदारद होते गए ? आखिर क्यों ?


ये कहावत तो आपने सुनी होगी कि ज्यों ज्यों इलाज किया त्यों त्यों बीमारी बढ़ती गई। अब सवाल है कि इलाज़ लापरवाही व अज्ञानता से किया गया ? या फिर इलाज करने वाले डाक्टर अयोग्य थे ? या लाइलाज बीमारी का इलाज किया जा रहा था ? लेकिन समस्याओं को बीमारी नहीं कहा जा सकता और आज़ सरकार समस्याओं को कांग्रेस द्वारा उत्पन्न बीमारी बताकर अपना पल्ला झाड़ रही है। आखिर इन्हीं समस्याओं को दूर करने के लिए तो कांग्रेस को सत्ता से बाहर किया था, और अब सरकार समस्याओं को बीमारी बताकर उससे पल्लू झाड़ती नज़र आती है। लेकिन कुछ समस्याओं को तो इन्होंने खुद पैदा किया है। उस पर जवाब तेरा भ्रष्टाचार व मेरा भ्रष्टाचार कह कर बेरो में गुठली मिलाने का काम करतीं हैं। आखिर जनता कब तक बर्दाश्त करेंगी ? सवाल तो है।

नोट बंदी से लेकर आज़ की सभी समस्याओं को लेकर सरकार, देश की जनता से अक्सर धैर्य रखने की अपील करती हुई नज़र आती है। कभी अच्छे दिनों के नाम पर, कभी आत्मनिर्भरता के नाम पर, कभी वैश्विक परिस्थितियों का हवाला देकर। लेकिन सवाल एक यही है कि आखिर जनता के धैर्य की परीक्षा कब तक ली जाएगी?

एक तरफ अर्थव्यवस्था की रफ्तार को लेकर लगातार चिंताएं उठ रही हैं। बेरोजगारी के आंकड़े युवाओं के भविष्य पर सवाल खड़े कर रहे हैं, वहीं रुपया समय-समय पर डॉलर के मुकाबले दबाव में दिखाई देता है। उधर सरकार विकास के बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन आम आदमी की जेब पर बढ़ती महंगाई का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। रसोई गैस, खाद्य पदार्थों और रोजमर्रा की जरूरतों की कीमतों ने मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों का बजट बिगाड़ दिया है।

शिक्षा व्यवस्था की स्थिति भी चिंताजनक है। बार-बार सामने आने वाले पेपर लीक के मामले यानी 10 सालों में 90 पेपर लीक, लाखों छात्रों के सपनों के साथ खिलवाड़ नहीं तो क्या है ? वर्षों की मेहनत कुछ घंटों में भ्रष्ट तंत्र की भेंट चढ़ जाती है, लेकिन जवाबदेही तय होने के बजाय केवल आश्वासन मिलते हैं। आखिर क्यों ? आज़ तक किसी पर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई सवाल तो है ?

विदेश नीति को लेकर भी विपक्ष और कई विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं। पड़ोसी देशों के साथ संबंधों से लेकर वैश्विक मंचों पर भारत की स्थिति तक, कई मुद्दों पर सरकार आलोचनाओं का सामना कर रही है। जो नेतृत्व स्वयं को विश्व राजनीति का निर्णायक खिलाड़ी बताता था, उसके सामने आज कई नई चुनौतियां खड़ी हैं। आखिर जवाबदेही किसकी है ?

पीएम केयर्स फंड को लेकर पारदर्शिता की मांग वर्षों से उठ रही है। लोकतंत्र में जनता यह जानना चाहती है कि उसके नाम पर जुटाए गए धन का उपयोग किस प्रकार हुआ। पारदर्शिता और जवाबदेही किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद होती है। फिर भी ज़वाब क्यों नहीं ?

हाल में राम मंदिर निर्माण के लिए जुटाए गए चंदे के उपयोग को लेकर भी विवाद और आरोप-प्रत्यारोप सामने आए हैं। ऐसे विवाद करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं को आहत करते हैं , और पारदर्शिता की आवश्यकता को और अधिक मजबूत बनाते हैं। लेकिन इतने बड़े मुद्दे पर आज़ तक एफ आई आर तक दर्ज नहीं कराई आखिर क्यों ? अब सरकार क्या छुपाना चाहती है ? अब सब कुछ तो सामने आ चुका है, धर्म व आस्था के नाम पर ऐसी चोरी क्यों हुई ? और इसका जिम्मेदार कोन ? जवाबदेही किसकी ? सवाल तो है। लिखते लिखते जानकारी मिली कि मध्यप्रदेश सीएम के परिवार ने योजना की जानकारी के चलते भविष्य में मुनाफा खोरी के लिए 160 एकड़ जमीन खरीदी की। तो क्या सत्ता या राजनीति मुनाफा कमाने का साधन बन गया है ?

लोकतंत्र में जनता केवल वोट देने वाली मशीन नहीं होती। वह सवाल भी पूछती है, जवाब भी मांगती है और जवाबदेही भी तय करती है। यदि समस्याएं बढ़ती जाएं और जवाब कम होते जाएं, तो जनता का धैर्य भी एक दिन समाप्त हो जाता है। सत्ता की सबसे बड़ी ताकत जनता का विश्वास होता है, और जब वही विश्वास डगमगाने लगे तो किसी भी सरकार को आत्ममंथन करना चाहिए। अन्यथा अस्तित्व कब इतिहास बन जाएगा इसका भी भय तक नहीं आखिर क्यों ?


नरोत्तम शर्मा

वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभ लेखक

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